يا مصر عودي / الشاعر والإعلامي محمد نصيف

 

"يا مصرُ عودي " 

الشاعر والإعلامي محمد نصيف 

ظـَمِـئْـنـا إلى غــيــث ِ الـعــروبــة ِ هـاطـلا    فـيـا مـصـرُ فــيـضـي وابـلاً فاضَ وابـلا 

تـَحـِـنُّ لــدفــق ٍ مـِن نــداك ِ جــروحـُــنـــا    فـصـبـِّي بـأعــمــاق ِ الـجــروح ِ جــداولا 

سـنـونَ عـجـافٌ قـدْ عــصـرنَ ضـلـوعـَـنـا    فــثـوري على قـحـط ِ السـنـيـنَ سـنابـُلا 

غــيــابـُـكِ ألــقـى فـي الــقــلــوب ِ مـــرارة ً   ومـا قـَـبـِـلـَـتْ عــنـكِ الـقــلـوبُ بـدائـلا 

بـدونـِـك ِ كــنـَّـا كـالــيــتــامـى بـضـعــفـِـنـا    أردنـاك ِ فـي دنـيـا الـتـعــسـُّـف ِ كـافــلا 

وتـدريــنَ أن الـحــزنَ جــفــَّفَ نــبــضـَـنــا    وأنـّا حـَـنـَـتْ مــنــا الـهــمـومُ كـواهــلا   

تــوســـدت ِ الأوجـــاعُ نـــزفَ جــراحــنـــا    وما زال شعـبي عَـنْ هـواك ِ مـنـاضـلا 

ومَـنْ يــعــتــقــدْ فـي أنَّ حــبـَّـكَ قـدْ عـَـفـَـا    يـكـنْ فـي مـعـايـيـر ِ الـمـحـبـَّةِ جـاهـلا 

ولــكـــنـَّــنــا نــدري بــصــمـــتـِـكِ ثـــورة ٌ    سـتحـيي مِنَ الـيأس ِ العـمـيـق ِ تفاؤلا 

تــتــوقُ إلـى نــور ِ الــخــلاص ِ دروبـُـنــا    فـحـُـفـِّي دروبَ الـزاحـفــيــنَ مـشـاعـلا 

أديـمـي بــروح ِ الــثـائــريــنَ لـهــيــبــَهــا    وكـونــي بـأركــان ِ الـــطـــغـــاة ِ زلازلا 

وجـرّي بـسـاط َ الـبـؤس ِ مـمـنْ تـســيَّـدوا    وهـُـمْ سـافــلٌ يـأتـي لـيَـخـْـلـُـفَ سـافــلا

لـقـدْ أطــفــأوا شــمــسَ الــعـــراق ِ لآمــة ً   أبــى حــاكــمــوك ِ الــعـــيــشَ إلا أراذلا 

وقـَدْ حـطـَّمـوا لـلـقـدس ِ أسـوارَ حـُلـْمـِهـا    فـكـانـوا بـأيـدي الـغـاصــبــيــنَ مـعـاولا  

سـيـرشــدُ شـيـنُ الـعـابــديــنَ كــثــيــرَهـُمْ    وهـمْ راحـلٌ عــنـهــا ســيــتــبـعُ راحـلا 

فــمــدّي إلـــيـــنــا لـلـــفـــداء ِ مــعـــابـــراً    لـنـلــقـى الأمـانـي شــاعــراً ومـقـاتـلا 

أعـــيــدي لــســاحــات ِ الـكِـنـانــة ِ إرثـَهــا    ولا تـقــبــلـي دونَ الـنـجـوم ِ مــنــازلا  

وقـومـي اســتــردي فـي الـحـيـاة ِ كـرامـة ً   أزيـحـي الـذي فـيـكِ اسـتـخـفَّ مخـاتـلا 

على الـجــرح ِ ســيــري لـلـنـزال ِ تـجـلـُّـداً    وغـيـظي الذي أجـرى عـليـكِ الـنـوازلا 

وردي إلـــيــكِ الــمــجـــدَ لا تـــتـــنــازلــي    فـمـا أنـتِ مـمـّنْ يُـحــســنـونَ تــنــازلا 

وعــودي إلى حـِـضـْـن ِ الــعــروبــةِ حــرَّة ً   فـمـا زلـتِ شـغـلاً لـلـمـحـبـِّيـنَ شـاغــلا 

سـتـبـقـيـنَ فـي ثـغــر ِ الـزمـان ِ حـقــيـقـة ً   لمنْ كانَ عـنْ معـنى الـبـطـولـة ِ سـائلا

 

 

 

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